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«Сады праведных» имама ан-Навави. Хадис № 1554



 

1554 – وعن سَمُرَةَ بْنِ جُنْدُبٍ — رضي الله عنه — ، قَالَ : قَالَ رسُولُ اللهِ — صلى الله عليه وسلم — :

(( لاَ تَلاَعَنُوا بِلَعْنَةِ اللهِ ، وَلاَ بِغَضَبِهِ ، وَلاَ بِالنَّارِ )) رواه أَبُو داود والترمذي ، وقال : (( حديث حسن صحيح )) .

 

1554 – Передают со слов Самуры бин Джундуба, да будет доволен им Аллах, что посланник Аллаха, да благословит его Аллах и приветствует, сказал: 

«Не проклинайте друг друга (и не призывайте на других) ни проклятие Аллаха, ни Его гнев, ни огонь».[1] Этот хадис приводят Абу Дауд (4906) и ат-Тирмизи (1976) который сказал: «Хороший достоверный хадис». 

Также этот хадис передали Ахмад (5/15), аль-Бухари в «аль-Адабуль-муфрад» (320), ат-Табарани в «аль-Му’джам аль-Кабир» (6858), аль-Хаким (1/48), аль-Байхакъи в «Шу’аб аль-Иман» (5160, 5161).

Шейх аль-Албани назвал хадис хорошим. См. «Сахих Аби Дауд» (4906), «Сахих ат-Тирмизи» (1976), «Сахих аль-Джами’ ас-сагъир» (7443), «Сахих ат-Таргъиб ва-т-тархиб» (2789), «ас-Сильсиля ас-сахиха» (893).

Также достоверность этого хадиса подтвердили Ибн Дакъикъ аль-‘Ид, хафиз ас-Суюты, Шу’айб аль-Арнаут. См. «аль-Икътирах» (127), «аль-Джами’ ас-сагъир» (9844), «Тахридж аль-Муснад» (20175).


[1] То есть: не желайте другим попасть в ад.

 

 

 

 

 

تحفة الأحوذي

محمد بن عبد الرحمن بن عبد الرحيم المباركفوري

 

قوله : ( لا تلاعنوا ) بحذف إحدى التاءين ( بلعنة الله ) أي لا يلعن بعضكم بعضا فلا يقل أحد لمسلم معين عليك لعنة الله مثلا ( ولا بغضبه ) بأن يقول غضب الله عليك ( ولا بالنار ) بأن يقول أدخلك الله النار أو النار مثواك ، وقال الطيبي : أي لا تدعوا على الناس بما يبعدهم الله من رحمته إما صريحا كما تقولون لعنة الله عليه أو كناية كما تقولون عليه غضب الله أو أدخله الله النار ، فقوله » لا تلاعنوا » من باب عموم المجاز لأنه في بعض أفراده حقيقة وفي بعضه مجاز وهذا مختص بمعين ; لأنه يجوز اللعن بالوصف الأعم كقوله لعنة الله على الكافرين ، أو بالأخص كقوله لعنة الله على اليهود ، أو على كافر معين مات على الكفر كفرعون وأبي جهل انتهى .

قوله : ( وفي الباب عن ابن عباس وأبي هريرة وابن عمر وعمران بن حصين ) أما حديث ابن عباس فأخرجه الترمذي في هذا الباب ، وأما حديث أبي هريرة فأخرجه مسلم بلفظ : لا ينبغي لصديق أن يكون لعانا ، وأما حديث ابن عمر فأخرجه الترمذيفي باب اللعن والطعن ، وأما حديث عمران بن حصين فأخرجه مسلم وغيره .

قوله : ( هذا حديث حسن صحيح ) وأخرجه أبو داود والحاكم وقال صحيح الإسناد .

 

 

عون المعبود

محمد شمس الحق العظيم آبادي

 

( لا تلاعنوا ) : بحذف إحدى التائين ( بلعنة الله ) : أي لا يلعن بعضكم بعضا فلا يقل أحد لمسلم معين عليك لعنة الله مثلا ( ولا بغضب الله ) : بأن يقول غضب الله عليك ( ولا بالنار ) : بأن يقول أدخلك الله النار مثلا ، وهذا مختص بمعين لأنه يجوز اللعن بالوصف الأعم ، كقوله لعنة الله على الكافرين ، أو بالأخص كقوله لعنة الله على اليهود ، أو على كافر معين مات على الكفر كفرعون وأبي جهل قاله القاري .

قال المنذري : وأخرجه الترمذي وقال حسن صحيح . هذا آخر كلامه . وقد تقدم اختلاف الأئمة في سماع الحسن من سمرة .

 

 

 

 

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